
शाम को लौटते वक़्त कहीं खोये जा रहा हूँ,
अपने घर को याद किये जा रहा हूँ।
शाम के धुंधलके में धुंधली होती ज़िन्दगी,
दफ्तर से थककर जाती ज़िन्दगी।
आकाश को चूमती ऊँची इमारते,
ज़िन्दगी को नीचा दिखाती इमारते।
तेज़ दौड़ती बहकती गाडियाँ,
ज़िन्दगी की रफ़्तार को कम करती गाडियाँ।
मै दूर तक देखता हूँ इन् जगमगाती गाड़ियों को,
पर क्यूँ मुझे बुझी सी लगती है यह ज़िन्दगी।
एक दूसरे से आगे निकलने की हौड में,
इन् गाडियों की दौड़ में।
इस गुजरते हुए पल में,
मै कहीं पीछे रह गया हूँ।
इस भीड़ में कहीं खो गया हूँ,
अपने वजूद को खो चूका हूँ।
भूल चूका हूँ उनको जो मुझसे मिलने की आस लगाये बैठे है,
जो मुझे हमेशा दिल में बिठाये बैठे है।
इस बार नहीं अगले इतवार का वायदा करता हूँ,
सिर्फ उनको नहीं अपने आपको भी धोका देता हूँ,
अपने घर को याद किये जा रहा हूँ।
शाम के धुंधलके में धुंधली होती ज़िन्दगी,
दफ्तर से थककर जाती ज़िन्दगी।
आकाश को चूमती ऊँची इमारते,
ज़िन्दगी को नीचा दिखाती इमारते।
तेज़ दौड़ती बहकती गाडियाँ,
ज़िन्दगी की रफ़्तार को कम करती गाडियाँ।
मै दूर तक देखता हूँ इन् जगमगाती गाड़ियों को,
पर क्यूँ मुझे बुझी सी लगती है यह ज़िन्दगी।
एक दूसरे से आगे निकलने की हौड में,
इन् गाडियों की दौड़ में।
इस गुजरते हुए पल में,
मै कहीं पीछे रह गया हूँ।
इस भीड़ में कहीं खो गया हूँ,
अपने वजूद को खो चूका हूँ।
भूल चूका हूँ उनको जो मुझसे मिलने की आस लगाये बैठे है,
जो मुझे हमेशा दिल में बिठाये बैठे है।
इस बार नहीं अगले इतवार का वायदा करता हूँ,
सिर्फ उनको नहीं अपने आपको भी धोका देता हूँ,
कहीं वक़्त कम न pad जाये डरता हूँ।
पर वोह मुझसे कोई शिकायत नहीं करते,
हर गम को अपने दिल में ही है सहते।
मै ज़िन्दगी की हर बुलंदियों को पायूं ,
येही तमन्ना उनकी रहती है,
येही तमन्ना उनकी रहती है,
उनकी दुआए हमेशा मेरे साथ रहती है।
पर मैं क्यूँ चाहकर भी उनके पास नहीं जाता,
क्यूँ भविष्य बनाने से फुर्सत नही पाता।
कहीं किसी बड़ी ख़ुशी के इंतज़ार में,
छोटी ख़ुशी की अहमियत नहीं जान पाता।
क्यूँ हंसी बचा कर रखता हूँ,
क्यूँ खिलखिलाने से डरता हूँ।
अपने कमरे की खाली दीवारों को ताकता हूँ,
बचपन के दिनों को याद करता हूँ।
कितने प्यारे थे वोह दिन,
कितने सुहावने थे वोह दिन,
कितनी रातें गुजारी मैंने तारो के संग।
वो तारे मुझे देखकर मुस्कुराते थे,
मानो मेरे गालो को सहलाते थे।
कितना सुन्दर था वो आसमान ,
कहानियो का समुन्दर था वो आसमान।
वो घर की छत पर सोना,
माँ के आँचल में सर छुपाकर कहानियां सुनना।
गर्मियों की छुट्टियों में नानी की गोद में खेलना,
पेड़ की घनी छाओं में ठंडी हवा खाना।
उन भीनी सर्दियों में धुप सेकना,
दादू के साथ कड़क चाय पीना।
इन दीवारों में क्यूँ इतना सूनापन है,
क्यूँ इतनी भीड़ में भी अकेलापन है।
अब तोह घर बन गया है रैन बसेरा,
लकीरों से भर गया है यह चेहरा।
घर जाने से पहले आने की हो जाती है चिंता,
जितना भी हो वक़्त ,कम ही है लगता।
घर जाने के मन बहाने ढूँढता है,
अब तो अपना शहर ही सकूं देता है।
देता है अपनेपन को वो मीठा सा एहसास,
खो जाता है जो दूर आकर,
जी करता है रहो हमेशा अपनों के आस पास।
इसी आस में चला जा रहा हूँ,
शाम को लौटते वक़्त कहीं खोये जा रहा हूँ,
अपने घर को याद किये जा रहा हूँ.
Try to brief and not to repeat any thing.
ReplyDeleteA wonderful creation indeed, actually delineates my state of mind!!!! Let the words flow forever and ever....
ReplyDeleteThanks for appreciating my effort.
ReplyDeleteAwesome yaar...mast hain..
ReplyDeleteAnd this feeling is common to all of us..kal jo banane ke chakkar mein chhoti chhoti khusiya bhul gaatein hain..
Awesome..and everyone of us relate to this..we are so busy in making future that we forget to enjoy the present..and those people and our home who has helped us to stand the place we are right now..
ReplyDeleteThanks Shivani for your wonderful comments
ReplyDeleteThis one is my favourite among all....it relates to our lives so closely..I was actualy imagining myself in each line of this poem..Great work Ravikant!!
ReplyDeleteThank u very much Abha.
ReplyDeleteamazing!! intense emotions expressed so beautifully...Brilliant work Ravikant bhai :)
ReplyDeletebahut bahut shukriya Ravi dost.
ReplyDelete