रोज सुबह निकलता हूँ बहार देखने के धोखे में,
पर यहाँ तो मिलते है सूखे पत्ते इंतज़ार में.
मै सोचता हूँ महसूस करूँगा एक फूल की महक को ,
उसकी चहक को ..उसकी पंखडीयो को .
पर उसकी डाल तो क्या ..उसके कांटे भी नही मिलते ,
क्यूंकि वो कांटे ..दिल में चुभ चुके है.
धंस चुके है गहरे ..शायद कुछ एहसास कराना चाहते है ,
अब इस दर्द को ही एक अमली जामा पहनाओ ..और उसी के आगोश में खो जाओ .
मै खुश हूँ की मैं ढक सकता हूँ अपने आप को ..इन् कांटो की ओट से ,
बचा सकता हूँ अपने आपको …आने वाली चोट से .
शायद यह कांटे मुझे इतना मज़बूत बना दे,
कि हर चुनौती को पार कर जाऊं …और जीत की और कदम बढाऊँ.
