रोज सुबह निकलता हूँ बहार देखने के धोखे में,
पर यहाँ तो मिलते है सूखे पत्ते इंतज़ार में.
मै सोचता हूँ महसूस करूँगा एक फूल की महक को ,
उसकी चहक को ..उसकी पंखडीयो को .
पर उसकी डाल तो क्या ..उसके कांटे भी नही मिलते ,
क्यूंकि वो कांटे ..दिल में चुभ चुके है.
धंस चुके है गहरे ..शायद कुछ एहसास कराना चाहते है ,
अब इस दर्द को ही एक अमली जामा पहनाओ ..और उसी के आगोश में खो जाओ .
मै खुश हूँ की मैं ढक सकता हूँ अपने आप को ..इन् कांटो की ओट से ,
बचा सकता हूँ अपने आपको …आने वाली चोट से .
शायद यह कांटे मुझे इतना मज़बूत बना दे,
कि हर चुनौती को पार कर जाऊं …और जीत की और कदम बढाऊँ.

Deep and dardili!!!
ReplyDeleteDhanyawaad Dhara ji,itne gahre comments ke liye !!
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